हमारी यह मानसिकता हो गयी है कि हम पिछड़े है, हम कमजोर है, हम कुछ नही कर सकते । जबकि पिछड़ी कोई जाति या व्यक्ति नही होता बल्कि पिछड़ी सिर्फ सोच या परिस्थिति होती है जिसे संकल्पशील मेहनत व प्रयास से बदला जा सकता है।
अगर हमारा समाज और व्यक्ति खुद को असंस्कृत, असभ्य और पिछड़ा मानता है तो सवर्ण समाज भी हमारे अंदर इस हीनभावना को पढ़ कर उसी भाषा में उत्तर देने लगता है। जिससे हमारी यह सोच और गहरी पैठ करती जाती है और हम उससे उबर नही पाते। इसका फायदा उच्च जातियां व राजनैतिक दल उठाते है।
इतिहास साक्षी है कि शत्रु के शौर्य-कौशल से नहीं, बल्कि हितैषियों की मूर्खता से सभी साम्राज्य ढहाए गए हैं। और यह मूर्खता अगर षड्यंत्रपूर्वक पैदा की गई हो तब तो इससे जितनी जल्दी बच निकलें उतना ही श्रेयस्कर है।
जब तक हमारा समाज अपने पूर्वजों, संतों और अपनी विरासत पर गर्व करना नहीं सीखता तब तक उसका वर्तमान और भविष्य खुद उसकी नजरों में निंदित रहेगा। दूसरी जातियों और समाज का उनके बारे में क्या मत है, वह भी हमारी इस आत्महीनता की भावना से उपजता है।
अब समय आ गया है कि हमे इस पिछड़ी सोच का परित्याग कर संकल्पशील होकर दृढ़ निश्चय के साथ अपने हकों को पाने का प्रयास करना चाहिए। जितना श्रम हम अपने आपको पिछड़ा व दलित एवम वंचित साबित करने में लगा रहे है उतना श्रम हम अपने विकास करने व अधिकारों को पाने में लगाएं तो कोई ताकत नही जो हमे विकसित होने से रोक सके।
हमे स्वार्थी राजनेताओं की कुटिल चालों को समझना चाहिए। वे हमें हमेशा कमजोर बताएंगे, हमेशा भयभीत रखेंगें, काल्पनिक डर दिखाकर हमे हमेशा भेड़ें बनाकर रखना चाहेंगे ताकि हम उधर टुरते रहें जिधर वे टोरें।
आज हममें से अधिकांश लोग शिक्षित है, साधन संपन्न है ,वे आगे आये और समाज को जागरुक करे। जिनमे
नेतृत्व करने की क्षमता है वे नेतृत्व के लिए अपने आप को प्रस्तुत करे। कोई जरूरी नही की सारे साधन आपके पास हों। जिनके पास नेतृत्व क्षमता है वे नेतृत्व के लिए आगे आएं , जिनके पास आर्थिक साधन है पर नेतृत्व नही करना चाहते वे नेतृत्व करने वालों को आर्थिक सहयोग करें। जिनके पास समय व विचार है वे समय व विचारों से सहयोग करें तो हम राजनीति में समाज के अच्छे लोगों को चुन कर भेज सकेंगे।
आज हमारे समाज मे अनगिनित सन्गठन व सामाजिक कार्यकर्ता सक्रिय है उन्हें चाहिए कि वे लक्ष्य निर्धारित करके कार्य करें। किये गए कार्यों के परिणाम सुनिश्चित करें।
बगैर अमल किए उन लक्ष्यों का कोई औचित्य नहीं होता। परिणाम के बिना आपके प्रयत्नों का कोई अर्थ नहीं हो सकता। हमे दूरदृष्टि के साथ अपने लक्ष्य निर्धारित करके उनको पाने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ेगा तभी हम इस पिछड़े पन के #अलंकरण से निजात पा सकेंगे।
इच्छा + स्थिरता = संकल्प, संकल्प + कड़ी मेहनत = सफलता..
हर रोज की तरह आज फिर यह शाम भी ढल जायेगी
रात होते ही हर ओर रौशनी जल जायेगी
कुछ भी नहीं बदलेगा सुबह नया सूरज निकलने से
हालात वही होंगे बस तारीख बदल जायेगी।
#नया_साल
क्या होगा नए साल में?
हर व्यक्ति ने उतने ही नए साल देखे है जितनी उसकी उम्र है।
हर व्यक्ति नए साल के नाम से उल्लासित होता है। सब एक तरह की उमंग से भर जाते है।
होने को तो हर दिन भी नया होता है। पर साल को हम एक विशेष अवधि के रूप में लेते है। उस साल की सफलताओं एवम असफलताओं का मूल्यांकन करते है। क्या अच्छा किया जिसका परिणाम सुखद या लाभदायक रहा अथवा उन्नति हुई और क्या गलत या बुरा हुआ जिससे नुकसान या अपयश अथवा जिससे हम पिछड़े।
अवधि इसका लेखा जोखा करने का अच्छा मौका होता है।
जिस तरह एक व्यापारी या कम्पनी वर्षान्त में अपना चिट्ठा मिलाता है और अपना नफा नुकसान देखता है। किस मद से कितना लाभ हुआ और किस मद से कितना नुकसान हुआ।
जिस मद से लाभ हुआ उसका व्यापार या उत्पादन बढ़ाने पर विचार किया जाता है और जिससे नुकसान हुआ उसका व्यापार या उत्पादन रोक दिया जाता है या उसको प्रॉफिटेबल बनाने का तरीका खोजा जाता है।
ठीक वैसा ही हमे व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन मे करना चाहिए। एक साल के खत्म होने पर हमें अपने कार्यों की विवेचना करनी चाहिए। अपने प्रयासों के प्रतिफ़ल का मूल्यांकन करना चाहिए। हमारे कौनसे प्रयास इफेक्टिव रहे कौनसे अनइफेक्टिव, किस क्षेत्र में हमने कितना हासिल किया कितना करना शेष है। जिस क्षेत्र में अचीव नही हो सका उसके लिए नए साल में कोई नई व प्रभावी रणनीति बनानी चाहिए।
As organisation हीरोज ने अपने चार सालों के कार्यकाल में हर साल एक लक्ष्य निर्धारित किया और उसके लिए भरसक प्रयास किय।े
★प्रथम वर्ष सूरत सम्मेलन में हमने देशभर के बुद्दिजीवियों को एक होने का आव्हान किया जिसका परिणाम संतोषजनक रहा और जो संख्या 100 से कम से शुरू हुई आज लाख से ऊपर है और देश भर से समाज बन्धु जुड़े है।
★ द्वितीय वर्ष का लक्ष्य हमने भिवानी में समाज बंधुओं को नाम के साथ आगे या पीछे #प्रजापति लिखने का रखा जिसके परिणामस्वरूप बहुत से साथी जो कोई भी सरनाम नही लगाते थे ,आज लगाने लगे है व जो सरनाम लगाते थे वे साथ मे प्रजापति लिखने लगे है। पर इसमे अभी आशानुकूल सफलता नही मिली है जिस पर हीरोज साथियों को ओर अधिक प्रयास करने की जरूरत है।
★तृतीय वर्ष हमने देवघर में माटीकला के संरक्षण व आधुनिकीकरण के लिए प्रयास करने का संकल्प लिया जिस पर काम करते करते अब तक हम रास्ते के मुहाने तक पहुंच पाए है ओर हमने इसके लिए अलग प्रकोष्ठ की स्थापना कर उसके लिए अनुभवी टीम बनाने की प्रक्रिया शुरू करदी है जो शीघ्र परिणाम देगी।
★ चतुर्थ वर्ष में हमने जोबनेर से समाज के सङ्गठनों को एक मंच पर आने का आव्हान किया था व समाज की राजनीति में भागीदारी हेतू प्रयास का ऐलान किया था जिस पर हमने बहुत प्रभावी प्रगति की है और इस को अमली जामा पहनाने के लिए 25 फरवरी 2018 को राजस्थान की राजधानी जयपुर में पदमश्री से सम्मानित माननीय श्री अर्जुन प्रजापति जी के नेतृत्व में एक राजनैतिक जागरूकता सम्मेलन का आयोजन करने जा रहे है जिसका मुख्य उद्देश्य उपरोक्त लक्ष्यों को प्राप्त करना ही होगा।
आफ्टर आल सीमित संसाधनों एवम समाज के सहयोग से काफी कुछ हासिल किया व बहुत कुछ करना बाकी है जिस पर इस #नव_वर्ष में संकल्पित होकर हमे पूरा करना है।
आओ सब मिकलर करें संकल्प
हम करेंगे समाज का कायाकल्प
जब तक मिले न लक्ष्य साथियों -- आगे बढ़ते जाओ।
खुला हुआ है द्वार प्रगति का -- निर्भय कदम बढ़ाओ॥
भय से रुकना नहीं, आंधियाँ चाहें कितनी आयें।
रूके नहीं पग पथ पर, चाहे टूट पड़ें विपदायें।
संकल्पों में शक्ति न हो, सामर्थहीन हो वाणी।
नहीं जमाने को बदले जो, वह क्या खाक जवानी।
सिद्घि स्वयं दौड़ी आयेगी -- अपनी भुजा उठाओ।
खुला हुआ है द्वार प्रगति का, निर्भय कदम बढ़ाओ॥
हो निज पर विश्वास दृष्टि से- लक्ष्य नहीं ओझल हो।
मोड़ें जग की राह, चाह में इतनी शक्ति प्रबल हो।
कांटो भरा देख पथ तुमने, हिम्मत अगर न हारी ।
चलते रहे विराम-रहित तो, होगी विजय तुम्हारी
नभ में उड़ो सुदूर गगन में, तोड़ सितारे लाओ।
खुला हुआ है द्वार प्रगति का, निर्भय कदम बढ़ाओ॥
खोना मत उत्साह, न नाता मुस्कानों से टूटे।
डूब रही हो नाव भंवर में, फिर भी धैर्य न छूटे।
जलते हुए अंगारे हों, या बर्फीली चट्टानें।
बढ़ते ही जाना रुकना मत, अपना सीना ताने।
कमर बांधकर चले अगर तो, फिर मत पीठ दिखाओ।
खुला हुआ है द्वार प्रगति का, निर्भय कदम बढ़ाओ॥
स्वाधीनता का रास्ता हमेशा सरल नहीं होता. बावजूद इसके कि कल्याण राज्य की अवधारणा मानवमात्र के लिए अधिकतम स्वाधीनता के विचार पर टिकी है, सभ्यताकरण की कोशिश में मानवीय स्वाधीनता पर निरंतर हमले होते रहे हैं. मनुष्य ने खेती करना सीखा. एक जगह टिककर खेती करते–करते एक समय ऐसा आया जब समाज के संसाधन मुट्ठी–भर आदमियों के हाथों में सिमट गए और बाकी लोक उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करने को विवश हो गए. धीरे–धीरे भूमि और अन्य संसाधनों पर कब्जा जमाकर एक वर्ग दूसरे वर्ग का मालिक बन बैठा. खुद को सर्वेसर्वा बताकर वह लोगों से मन चाहा काम लेने लगा. जनसाधारण का जीवन संघर्ष और त्रासदियों से भरा था. सो सबसे पहले धर्माचार्य मदद के लिए आगे आया. संघर्ष से थके–हारे लोगों का आवाह्न करते हुए उसने कहा—‘तुम मुझे दान दो. मैं तुम्हें संघर्ष से सदा के लिए मुक्ति दिलाऊंगा.’ लोग दान देने लगे.हालात ज्यों की त्यों रहे. परेशान लोग धर्माचार्य से मुक्ति के बारे में पूछते तो उसका एक ही जवाब होता—‘मसीहा का इंतजार करो. अपनी संतान को संकट में देखकर वह मदद के जरूर आगे आएगा.’ लोगों ने इंतजार किया. कुछ दिनों बाद लोगों की निराशा बढ़ने लगी. तब तलवार लिए एक व्यक्ति आगे आया, बोला—‘मैं तुम्हारा राजा हूं. तुम मुझे कर दो. मैं तुम्हें दुश्मनों से बचाऊंगा.’ लोगों ने उसे कर देना शुरू कर दिया. थोड़े दिन बाद सैनिक ने पुरोहित से दोस्ती कर ली.प्रजा वैसी की वैसी ही रही. फिर एक दिन एक और व्यक्ति आया, ‘मैं व्यापारी हूं. तुम मेरे लिए काम करो. मैं तुम्हें सारे कष्टों से मुक्ति दिलाऊंगा.’ हताश लोगों ने दिल और दिमाग दोनों व्यापारी के यहां गिरवी रख दिए. बाद में पुरोहित, राजा और व्यापारी एक साथ मिल गए. पुरोहित राजा और व्यापारी के भले के लिए पूजा करने लगा. राजा व्यापारी के धन की देखभाली में जुट गया. और व्यापारी उसका व्यापार दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था. राजा उसके धन की रखवाली करता, पुरोहित उसके लिए हवा बनाने का काम करता. जनता उन तीनों की गुलाम बनकर रह गई.
कहानी से पता चलता है कि दिमाग की गुलामी देह की गुलामी से चार कदम आगे चलकर आती है. मनुष्य पहले मानसिक रूप में दास बनता है, बाद में दैहिक रूप में. ऊपर के उदाहरण में मनुष्य के समक्ष एक के बाद एक स्थितियां जन्म लेती हैं. हर बार उसके विवेक पर कोई और कब्ज़ा करता चला जाता है.
Carefully and follow eachone
The importance of "Unity of Command"
in a social Organisation.
साथियों हम सामाजिक सङ्गठनों का निर्माण कुछ सामाजिक उद्द्देश्यों या लक्ष्यों की प्राप्ति हेतू करते है।
जिसमे हम समान विचार धारा के उन सामाजिक साथियों को साथ लेते है जिनकी उन उद्द्देश्यों या लक्ष्यों को प्राप्त करने या उनके लिए संघर्ष करने की सहमति हो।
सन्गठन या संस्था के गठन के बाद हम उसका वैद्यानिक या परस्पर सहमति से एक गाइडलाइन या संविधान बनाते है जिसके अंतर्गत हम कुछ व्यक्तियों को उसके संचालन की जिम्मेदारीयाँ सौंपते है जो लगभग उनकी सामर्थ्य के अनुरूप होती है।
अर्थात सन्गठन मे जिसे भी ओर जिस स्तर पर भी
कमांड दी जाती है उसकी कमांडिंग सूझबूझ व क्षमता भी उसी के स्तर की होती है।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जो लोग होते है उनकी योजनाएं एवम उनको लागू करवाने व परिणाम प्राप्त करवाने की क्षमता राष्ट्रीय स्तर की होती है, प्रमंडल व राज्य स्तरीय पदाधिकारियों की उस स्तर की तो जिला एवम क्षेत्रीय पदधिकारीयों की उसके अनुरूप।
सन्गठन मे जिम्मेदारी उनकी कार्य क्षमता, वरिष्ठता , अनुभव और सन्गठन व उसके उद्द्देश्यों के प्रति समर्पण व आस्था को ध्यान में रख कर दी जाती है।
सन्गठन के समस्त पदाधिकारियों को चाहिए कि वे
सन्गठन के मंच पर सन्गठन व उसके उद्द्देश्यों को ही सर्वोपरि माने। किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत लाभ, निजी महत्वाकांक्षा या हित को प्राप्त करने के लिये
सन्गठन के पद का कतई इस्तेमाल नहीं करे।
किसी भी सच्चे सामाजिक सङ्गठन के उच्च पदाशीन
नेतृत्वकर्ता निःसन्देह समाज की परवाह करने वाले व समान एवम सङ्गठन के प्रति आस्थावान व ईमानदार होते है अतः उनका अनुशरण हमें आंख मूंद कर करना चाहिए , क्योकि उन्हें हर कसौटी पर जांच परख कर ही हम उन्हें सन्गठन या समाज की कमान सौंपते है। तभी हम सामाजिक उद्द्देश्यों की पूर्ति कर पाएंगे।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पदाधिकारी अपने उच्च पदाधिकारी से निर्देश ले कर अपने विभाग के अधीनस्थ पदाधिकारियों को उसके अनुरूप निर्देश दें एवम अधीनस्थ पदाधिकारी उन निर्देशों का सन्गठन के सिद्धांतों के अनुरूप पालन करते हुए अपनी टीम से
उस उद्देश्य, लक्ष्य या मिशन को अंजाम दिला कर उसी कड़ी के माध्यम से वापिस उच्चतम कमान तक रिपोर्ट करे।
इसप्रकार एक आदेशक का अनुशरण करने से हम दिग्भर्मित होने से बचेंगे ओर विषय के प्रति कोई संशय भी नहीं रहेगा जिससे कार्य निष्पादन आसान होगा।
सन्गठन के हर सदस्य या किसी भी स्तर के पदाधिकारी को पद पाने या अपने आप को हाईलाइट करने के लिए साजिशों या निम्न स्तरीय हथकंडों का इस्तेमाल करने की बजाय पूरी निष्ठा एवम समर्पण से सङ्गठन के लक्ष्य हासिल कर अपने आपको स्थापित करना चाहिए। सङ्गठन मे कोई पदाधिकारी आजीवन नही चुना जाता , सबका एक निश्चित कार्यकाल होता है इसलिए अगले पायदान पर पहुंचने के लिए अपने कार्य निष्पादन क्षमता का प्रदर्शन कर अपने आपको उसका दावेदार बनाना चाहिए। क्योंकि सङ्गठन को तो आगे से आगे जिम्मेदार व्यक्तियों की जरूरत रहेगी ही।ओर आपकी कार्यक्षमता व कार्य निष्पादन के परिणामों के अनुसार आपको सन्गठन मे पद मिलना सुनिश्चित है।
प्रिय साथियों सम्माननिय पदाधिकारी गण व हीरोज के मिशन से जुड़े हर समाज बन्धु व बहनों से निवेदन है वे हमेशा अपने नेतृत्वकर्ताओं के निर्देशों का पालन कर उनके दिए गए हर मिशन पर अपना अधिकतम सहयोग दें व हमारे निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में योगदान करें।
ऐसा आप करते भी आये है उसी का परिणाम है कि हीरोज का कोई भी मिशन कुछ ही घण्टों मे देशभर के साथी परिणीति मे बदल देते है। और आप सब की बदौलत ही हीरोज आज आदेश की अनुपालना व अनुशासन की मिसाल बन गया है।
इस गौरव का बचाये रखना हर हीरोज अपना कृतव्य समझे।
जय श्री दक्ष
जय माँ श्रीयादे
जय भक्त गोरा कुम्भार
जय राजा शालिवाहन
जय डॉ रत्नप्पा जी कुम्भार
जय सन्तराम जी BA
जय शहीद रामचन्द्र जी
