इतिहास के पन्नों से
08:25सृष्टि रचनाकार प्रजापति ब्रह्मा कुम्हार ही है जो कालचक्र से मिट्टी के मानव बनाते है और मिट्टी में ही मिला देते है।
ब्रह्मा सर्वगुण सम्पन्न होने के कारण प्रजापति की उपाधि से विभूषित है। प्रजापति ब्रह्मा के मूलनाम के वंशजों ने दक्ष प्रजापति तक पृथ्वी पर वैभवशाली शासन किया है।
दक्ष प्रजापति में भी सर्वसम्पन्न कुल विद्यमान थे। ये उच्च कोटि के ब्राह्मण थे इनके समान कोई यज्ञ वेता नहीं है। ये क्षत्रिय श्िक्त के है, इनमें वैश्य के गुण भी है तो ये अच्छे सेवक भी है। कुम्हार जाति अपने पूर्वजों के गुण-धर्म-दोष से ओत-प्रोत है।
कुम्हार जाति में सभी युग है इसी कारण इन्हें प्रजापति नाम की उपाधि मिली है।
जो जाति सब जातियों की संसार की आदि व पूर्वज जाति है जो भारत व संसार के कोने-कोने में है उसके बारे में उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ लोग कहते है कि कुम्हार जाति राजपूतों से निकली जाति है जबकि राजपूत नाम तो मुसलमानों को दिया नाम है जो मुगलकाल के समय से प्रचलित हुआ है। पहले ये क्षत्रिय नाम से जाने जाते थे और इनके पूर्वज व ये कुम्हार ही है। इनका शरीर कुम्हार है। मिट्टी का है जो मिट्टी में ही समा जाता है।
अतः जिस क्षत्रिय (राजपूत) जाति की उत्पति का श्रोत ब्रह्मा है और ब्रह्मा कुम्हार है राजपूत जाति से कुम्हार जाति निकली है कहा जाय ये तो वही बात हुई जैसे कुए से पानी चाठ में, चाठ में कुण्डी में, कुण्डी से कोठे में और कोठे से खेली में और कुंआ ये कहे कि मेरा पानी तो खेली से आता है।
तो आप समझ गये होंगे कि कुम्हार कौन है?
कुम्हारों से कलियुग में रंकण-बंकण नाम के उच्च कोटि के गृहस्थ संत हुवे जिसके अनुयाई आज रांकावत स्वामी समाज के नाम से अपने गौरवमय सफर में चल रहे है।
पिछली 20वीं सदि में कुम्हारों की बड़ी ढाणी, कानासर, बीकानेर में गृहस्थी सन्त गणेशनाथ जी ने कठोर तपस्या की और पांच दिन पहले घोषणा की मैं अमुक दिन शरीर का त्याग करूंगा और पांचवे दिन व्याख्यान देकर कहा अब मैं चलूं और शरीर छोड़ गये।
श्री धाराजी, अजीतगढ़ में बाल ब्रह्मचारी संत गोपाल भारती ने ग्यारस के दिन सुर्योदय के दर्शन करके शरीर छोड़ा था।
अतः कुम्हार उच्च कोटि के ब्राह्मण है, संत है, उच्च कोटि के क्षत्रिय है उच्च कोटि के वैश्य है तो उच्च कोटि के शूद्र (सेवक) है।
पाण्डवों के राजसूययज्ञ में श्री कृष्ण ने सेवा करने पर भीष्म पितामह ने सम्मान दिलाया था तो सेवा करना तो सर्वापरि है कुम्हार सभी गुणों से ओत-पा्रेत है इसलिए इन्हें प्रजापति कहते हैं पर सती प्रकरण की महापंचायत में राजकीय शक्ति को निष्क्रय कर दी जिस दिन इस अभिशप्त से कुम्हार मुक्त हो जायेंगे राजसत्ता भी इनकी मुट्ठी में होगी। अभी कुम्हारों का सत्ता परिवर्तन करने में मुख्य मौन भूमिका है।
ब्रह्मा प्रजापति के वंशज प्रजापति ही है। प्रजापतियों ने नये-नये अनुसंधान किये इसलिए श्रेष्ठ या आर्य कहलाये। ऋषि-मुनियों की प्रेरणा के कार्य किये इसलिए आर्ष भी होने चाहिये थे, परन्तु हिन्दू कैसे हो गये? हम भारतीय होने चाहिये। हिन्दुस्तानी ओर इण्डियन कैसे हो गये?
हम प्रजापति होने चाहिए।
ò ही ब्रह्माण्ड की सर्वोपरि शक्ति है। ब्रह्माण्ड की रचना ò ने की है। प्रजापति ब्रह्मा ही सृष्टि रचियता है। जिन्होंने ब्रह्माण्ड की रचना के बाद पृथ्वी पर सजीव-निर्जीव के स्वरूप बनाये। पंच महाभूतों, ग्रहों, नक्षत्रों आदि के साथ विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु-वनस्पति के पेड़-पौधों का सृजन किया। इनका पालन-पोषण किया। सत्-असत् की क्रिया कलापों का सृजन किया।
ब्रह्माण्ड के पृथ्वी ग्रह पर प्रजापति ब्रह्मा ने काल चक्र से सत्-असत् का सृजन किया है।
इन्हीं में मानवरूपी जीव का भी मिट्टी से सृजन किया। मानव मिट्टी का होता है। मिट्टी से जन्म लेता है। मिट्टी में ही फलता-फूलता है। मिट्टी में क्रिया-कलाप करता हैं। मिट्टी में रहकर सृष्टि निर्माण कर्ता के साथ मिलकर सृष्टि के विकास में सहयोग करता है। बच्चा जन्म के समय गीली मिट्टी का होता है। मानव-मरकर मिट्टी में मिल जाता है। अतः जब मानव रूपी जीव विकास करते-करते शैशव काल में आता है तो मिट्टी से खेलता हैं मिट्टी से खेलते-खेलते पत्थरों से खेलता है।
मिट्टी के घरौन्दे बनाता है। घरौन्दो को तोड़ता है।
इस प्रकार चलते-चलते मिट्टी के पात्र बनाता है। पत्थरों को तोड़ते-तोड़ते अग्नि की चिनगारियों को समझता है।
अग्नि का अविष्कार करता है। पत्थरों को तोड़ते समय जो पत्थर गिरते हैं और गोल-गोल उछलते गिरते देखकर प्रेरित होकर पहिये का आविष्कार किया।
पहिये, चक्र का अविष्कार करता है, उसे धुरी पर चलाता है।
ओर अपने गुण-धर्म के अनुसार मिट्टी के बर्तन बनाता है। पत्थर के बर्तन, औजार आदि बनाता हुवा प्रगतिपथ पर चलता रहता है।
इस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा मिट्टी से जिस मानव रूपी जीव को बनाता है। मानव अपनी बुद्धि कौशल से अपने जन्मदाता, सृजनकर्ता, प्रजापति ब्रह्मा के गुण-धर्म प्राप्त करके जीवों में सर्वश्रेष्ठ शक्तिशाली जीव बन जाता है।
इस प्रकार मानव चक्र से, पहिये से मिट्टी के विभिन्न प्रकार के बर्तन बनाता है जो टूट जाने पर मिट्टी में मिल जाते हैं। मानव भी मरकर मिट्टी में मिल जाता है।
प्रजापति ब्रह्मा के इस गुण के कारण प्रजापति ब्रह्मा व प्रजापति द्वारा सृजन किया गया मानव भी कुम्भकार, कुम्हार कहलाता है।
मानव जब कुम्भकार रूप में था तब चक्र, पहिये व अग्नि का आविष्कार किया।
पहिये को ध्ुरी पर घुमाया। सृष्टि रचना में प्रथम वैज्ञानिक चमत्कार किया। आज कुम्भकार के इसी आविष्कार के कारण विज्ञान ने इतनी तरक्की की है।
इस प्रकार मानव ने सत्युग से त्रेतायुग से द्वापर युग और कलियुग के इस काल तक के सफर में कई उतार-चढ़ाव, प्रलय-महाप्रलय देखे है।
जब मानव जंगीली था। वनस्पति से, जीवों से उदरपूर्ति करता था। ऐसा करते-करते कृषि-गोपालक तक के सफर में मानव ने परिवार-समाज, कबीलों, गांवों, नगरों तक का सफर किया है।
इस तरह मानव ने सनातन धर्म के वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। शास्त्रों, शस्त्रों आदि का ज्ञान प्राप्त किया। कई वैदिक अनुसन्धान किये तो आर्य कहलाया, श्रेष्ठ कहलाया और आर्य संस्कृति बनी। साथ ही मानव ने अपनी पहिचान के लिए अपने कार्यों, स्थानों, नामों के चिन्ह बनाये। वर्ण बनाये, कालान्तर में ये चिन्ह जातियाँ कहलाने लगी। परन्तु इस जातीय पहिचानों में कोई ऊँच-नीच नहीं थी। वर्णों में कोई ऊँच-नीच नहीं थी।
जो लोग पढ़ लिख गये वे ब्राह्मण, जो सुरक्षा के कार्य करते वे क्षत्रिय, जो कृषि-गोपालन का कार्य करते वे, वैश्य तथा इन तीनों वर्णों को जो सहयोग करते वे शूद्र कहलाते थे। ये सब पहिचान के लिए, एक सुव्यवस्थित व्यवस्था के लिए था।
शूद्र भी ब्राह्मण वर्ण का कार्य कर लेता तथा ब्राह्मण शूद्र का कार्यकर लेता इसमें किसी के प्रति हीन भावना नहीं थी। सभी, सभी को समान समझते थे।
चलते-चलते प्रकृति के गुण धर्म के अनुसार मानव में विकृतियां आई।
लोभ, मोह, माया, क्रोध आदि का उत्सर्जन हुआ। जातियों-उपजातियों में भेद-भाव होने लगा।
क्षत्रिय अपने को श्रेष्ठ समझने लगे, ब्राह्मणों ने भी अपनी श्रेष्ठता की पहिचान दे दी।
इस भेद-भाव के कारण कई लोग प्रताड़ित होने लगे उन्हें लगने लगा कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है ओर ऐसे लोगों का आक्रोश समय-समय पर उबलकर बाहर आने लगा। विद्रोह होने लगे।
इस प्रकार - सुर-असुर दो विचारधाराओं का उदय हुवा जो आज तक के सफर में विभिन्न नामों की पहिचान लिये हुए हैं।
सतयुग के अन्तिम समय तक मानव पूर्ण रूप से विकसित था।
उस समय तक ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ आश्रम, संन्यास आश्रम आदि की अच्छी व्यवस्था हो चुकी थी।
सनातन धर्म की विवाह प्रथा कई प्रकार की थी।
आज संसार में जितनी भी विवाह प्रथा हैं वे सब प्रथाएं सत्युग में सनातन धर्म में मान्य थीं, प्रेम विवाह में छूट थी मानता है। सनातन धर्म संसार को परिवार मानता है।
मानव ने एक जंगली कुम्भकार से सफर शुरु करके राज्य और राजा तक का सफर तय किया था इस सफर में ईर्ष्या, मोह, माया-अहंकार का उदय हो गया था।
राजा में श्रेष्ठता का अहंकार आने लगा। इसी अहंकार के कारण दक्ष प्रजापति ने शिव को जंगली कहा, द्रविड़ कहा। परन्तु अपनी बड़ी पुत्री ‘सती’ के विवाह को शिव के साथ होने से रोक नहीं सका क्योंंक उस समय सामाजिक व्यवस्थाओं का कुछ तो पालन करना ही होता था।
परन्तु अपना अहंकार दक्ष प्रजापति छोड़ नहीं सका। प्रजापति दक्ष शक्तिशाली, यज्ञवेता सम्राट जो थे इसलिए ब्रह्मा के सभी गुण तो होने ही है, वेदों का ज्ञाता, धुरं धर यज्ञवेता, शक्तिशाली सम्राट होने के कारण दक्ष ने अहंकार में चूर होकर यज्ञ में शिव का स्थान न रखने से शिव का अनादर हुआ ओर अपनी पुत्री सती को हवन कुण्ड में भस्म हो जाने की घटना कर बैठे।
हाहाकार मचा, विध्वंश हुआ और अन्ततः ब्रह्माण्ड की प्रथम महापंचायत में हुई जिसमें दक्ष प्रजापति को दोषी माना, इस महापंचायत जो निर्णय हुआ, उसमें दक्ष प्रजापति को राज्य बहिष्कार का दण्ड मिला। इस प्रकार दक्ष प्रजापति के पक्षकार थे दक्ष के साथ हो गये उन्होंने भी राज्य बहिष्कार स्वीकार किया। अपने को जो कुम्भकार कहते है, प्रजापति कहते है वे आज भी राज्य शक्ति से बहिष्कारित ही है। यहां तक की प्रजापति ब्रह्मा का भी पूजा अर्चना का मन्दिर नहीं है।
जिन्होंने अपनी पहिचान बदल ली वे आज राजशक्ति के शिरोमणि बने हुवे है। परन्तु इनके पूर्वज तो प्रजापति ही है।
महापंचायत में दूसरा निर्णय यह हुवा कि जो स्त्री अपने पति के सम्मान में कार्य करेगी, मर मिटेगी आदि-आदि। उसे ‘सती’ की उपाधि दी जावेगी।
अब आप सोचिये कि आप कौन हैं, आपके पूर्वज प्रजापति ब्रह्मा हैं, आपके पूर्वज कुम्भकार हैं। यह भी सोचिये कि प्रजापति ब्रह्मा ने दक्ष के प्रति सहानुभूति दिखाई तो वे आज तक अलग थलग ही है।
एक बात और सत्युग में अच्छे-अच्छे कार्य होने लगे, मनुष्य निरन्तर अच्छे विकास कार्य करने लगा तो उसे श्रेष्ठ कहा जाने लगा। आर्य कहा जाने लगा इसलिए यहां के भू-भाग को आर्यावर्त कहा जाने लगा।
इस प्रकार आर्य-संस्कृति, सनातन धर्म का वर्चस्व पूरे ब्रह्माण्ड में प्रकाशित होने लगा।
ऋषि-मुनियों ने कई नये-नये अनुसन्धान किये, शास्त्र लिखे। इन्होंने प्राणी हित में, सृष्टि विकास में कई अच्छे-अच्छे नियम बनाये। इसलिए हम आर्य संस्कृति को आर्ष संस्कृति भी कह सकते है। अतः हम प्रजापति है, आर्य है, आर्ष है और भारतीय भी हैं, क्योंकि आर्यावर्त को विश्वामित्र की पुत्री शकुन्तला के शूरवीर पुत्र भरत के नाम से भारत भी कहा जाने लगा।
चलते-चलते मानव जब कलियुग में आता है तो मोह-माया-अहंकार का वर्चस्व बढ़ जाता है। ये वर्चस्व इतना बढ़ जाता है कि अपने पूर्वजों की पहिचान को भूलकर अपनी पहिचान में लिप्त होकर अपने धर्म-संस्कृति को भी विखण्डित करने में लगकर अपनी पहिचान की धर्म संस्कृति बनाने का प्रयास करने लग जाता है।
इसी क्रम में बौद्ध-जैन, ईसाई-इस्लाम आदि का प्रार्दुभाव होता है।
7वीं, 8वीं सदी में सनातन धर्म एक दम कमजोर होने लगता है तो प्रजापति शंकर नाम के युवक का उदय होता है औरॐ प्रजापति उन्हें विद्वान बनाते है और शंकर ऋषि-मुनियों को शास्त्रार्थ में हराकर आचार्य शिरोमणि बन जाता है।
इस प्रकार शंकर से शंकराचार्य ने सनातन धर्म-आर्य संस्कृति की रक्षा के लिए चार धाम बनाये और भगवा वस्त्रधारी संत-संन्यासी परम्परा शुरु करके इन धामों में विराजमान होने वाले को शंकर ने जगद्गुरु शंकराचार्य की उपाधि से विभूषित किया, जिनका मुख्य काम सनातन संस्कृति कहो, या आर्ष संस्कृति कहो पर आर्य संस्कृति-सनतान धर्म की रक्षा करना ही मूल ध्येय रखा गया था।
997 ई. में विदेशी आक्रमणकारी, लूटेरों का भारत में आगमन होने शुरु हो गया इन्होंने आर्यों को, प्रजापतियों को जबरदस्ती गुलाम (हिन्दू) बनाया जो इन ताकतों के अत्याचार सह नहीं कर सके उन्होंने धर्म परिवर्तन किया। वे मुसलमान बने।
सत्य तो ये ही है। ओर इन लूटेरों के दास बने, गुलाम बने, उन्हें हिन्दू कहा। इसी हिन्दू शब्द का इन शंकराचार्यों ने हिन्दू धर्म में परिवर्तन करने की कोशिश की है।
विस्तृत जानकारी के लिए खेजड़ा एक्सप्रेस 9.8.11, 9.8.13 व 24.3.14 के अंक पढ़े।
आज इस सत्य को भगवान प्रजापति ने उजागर किया तथा 1988 से सतत प्रयास से अन्तत 25 अगस्त 2014 को संत अखाड़ों शंकराचार्यों की धर्म संसद ने घोषणा की कि हमारा धर्म सनातन धर्म ही है। इस प्रकार भगवान प्रजापति को 27 वर्षों के प्रयास से सनातन धर्म को नवसंचार हुआ।
एक बार ओर - सुप्रीम कोर्ट ने कई बरस पहले कहा हिन्दुत्व जीवनशैली है अभी पिछले महिनों में केरल मन्दिर प्रकरण में बोला हिन्दु धर्म अब सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि मैं हिन्दुत्व पर गौर नहीं करूंगा क्यों? क्यों? क्यों?
क्योंकि हिन्दुत्व का सत्य खेजड़ा एक्सप्रेस दिनांक 24.3.2014 में सत्य उजागर हो चुका है।
शब्द ही ब्रह्म है। शब्द में शक्ति है! आज संसार में हिन्दू शब्द के कारण ही हिंसा, भ्रष्टाचार, लूट, बलात्कार का वर्चस्व हैं ये शब्द फारसी है अतः इस्लामिक हिंसा सर्वोपरि हो रही है। इस शब्द में नकारात्मक ऊर्जा भरपूर बढ़ गई है। इसे रोकना होगा। इसको संविधान से हटाना होगा। संसार के शब्दकोष से हटाना होगा।
यदि कोई वास्तविक आध्यात्मिक इस आलेख को पढ़ रहा है तो वे जरूर समझेगा कि बार-बार एक झूठ को बोलने से वह झूठ सिद्ध हो जाता है और अपनी शक्ति प्रदर्शित करता है । किसी वैदिक मंत्र या अन्य मन्त्र को बार-बार जपने से वह अपनी शक्ति के अनुसार सिद्ध हो जाता है। अपनी शक्ति प्रदर्शित करता है।
वाल्मीकि ने राम नाम का जप किया प्रहलाद ने राम का जप किया ध्रुवकुमार ने ò नमो भगवते वासुदेवाय का जप किया। विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र का जप किया ओर क्रूर सम्राट से ब्रह्मऋषि बन गये। गांधीजी ने राम का जप किया। अतः समझो, सोचो ओर कहो आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते शब्द ही ब्रह्म है शब्द में शक्ति है अतः हम कुम्हार है, आर्य है आर्ष है पर हिन्दू नहीं है।
ॐ तत्सत्!
1979 में राजस्थान कुम्हार सम्मेलन श्री कोलायत में हुआ जिसके उद्घाटन में श्री श्री 1008 श्री शंकराचार्य श्री निरंजनदेव पधारे थे उन्होंने ने भी कहा कि सब कामों में दक्ष होने के कारण कुम्हारों को प्रजापति कहते हैं। प्रजापति कुम्हारी आदि जाति है जो मेहनती व सत्यनिष्ठ है।
पिछली सदी में जोधपुर के अचलुराम लिम्बा ने एक पुस्तक लिखी जो कुम्हारों के सही इतिहास बताती है कोई समझे, क्योंकि कुम्हारों में आज भी दक्ष प्रजापति का अहंकार गुण विद्यमान है।
ॐ तत्सत्! ॐ शांति!
अधिक जानकारी के लिए संपर्क -0917737957772
Bhagwan Prajapati Brahmandguru-adhishthata's photo.
Bhagwan Prajapati Brahmandguru-adhishthata's photo.
32 comments
Prajapati samaj ko vaishya varna mai rakha gaya h. Kyuki.
ReplyDeletePrajapati samaj shivji ke yug brahman tha fir ishi Doran samaj ke maharaja daksh prajapati ko nandi ke doura sarap mila ki prajapati samaj bramhan se hat kar ger bramhan ho jaoge.
Phir ram yug mai prajapati samaj kshatriya mai aa gya tha.
Phir krishn yug mai vaishya mai gya tha prajapati samaj. Ishi Doran krishn lala yosoda maa se darte hue ek kumhar ke ghar mai chup gye aur fir ush kumhar ne sarp mukt hone mang kari fir krishna sarap mukt kiya tabse hum vaishya mai ate h.
Why u called urself prajapati call chamrs urself
DeleteAgar aap sahi Hain to Daksha prajapati ki vanshavali ko ujagar kare
DeleteHaa mai kar dunga aapne bhan ko bhej de
DeleteTu sale chamr..
Karamkandi Kumharo or Kumbharo ke sath Verman verma, singh, chhetri, rane raje etc. title lagate hain
DeleteVerman Verma ka arth kshatriya hai
Lakho Kumbharo ke sath Verman Verma lagta hai jiska arth Kshatriya or chhetri
Lakho Kumbharo ke sath Prajapati lagta hai jiska arth Kshatriya, chhetri Raja, Rajan Rajanya, viraat, dev, ghummar or ghunkkad, rishi hai
Lakho kumavat likhte hain jiska arth bhumi ka rakshak or Kshatriya hai
Paul or pal, wodeyar, chera, chola, pandeya(Verman or Verma smrajya) dakshin Bharat or Bengal me
Hindu ritual system me Kumhar are Kshatriya or chhtri hai
Hum janam se Kshatriya or karam se Kumhar or Kumbhar hai.
Karamkandi brahmin kumhar or Kumbharo ke sath Verman, Verma, singh, chhetri, Kshatriya lagate hain
DeleteUp mp ashmed on u sirf reservation ke chhakr mein khud ko gira rhe
ReplyDeleteOmveerPrajapati
ReplyDeleteVery very nice
ReplyDeleteRight
ReplyDeleteThen why up people crying for sc status kya wo itne gir gye hain ki apne samj ko hi girane lg pade hain
ReplyDeleteVaise bhi kahi kahin aaj bhi kumharon k hath ka Pani bhi nhi pite sawarn. Aur aaj bhi unke sath atyachar ho raha hai. Pandito k talve chato usi me tumhari bhalayi h. Jo purvaj karte rhe sawarno ki gulami. Ab hame manjoor nhi. Aap ko Mubarak ho. Aur aap see nivedan hai ki dharm k chakkar me samaj ko gumrsh na Kare. Dhanybad
DeleteHamare State me Kumhar Or Kumbhar swarna hai.
DeleteHume Brahmin Bhojan cook karne ka adhikar hai.
According to shastra and shastrasahinta, Brahmin can accept kaccha and pakka food from Kumbhar or kumhar and kayasth etc. Caste. But Kumbhar or
DeleteKumhar ko rund mund Rajput or jo gala kate kahte hain jo kuch prohibition dalta hai
High caste Brahmin have equal prohibition to Kumbhar or kumhar, Rajput and jaat etc. caste.
Kumbhar or kumhar, in whole india(pure or clean) Nepal(clean or pure) bangladesh(pure or clean) , Pakistan(pure or clean) Srilanka(pure or clean), Hindu(pure or clean), muslim(pure or clean), jain(pure or clean), budhism(pure or clean), sikhism(pure or clean) hai
DeleteKumbhar, 97 percent clean or pure hai. . Jo chalk per kaam karte hain, stick ke sath
Kuch aise Potter bhi hai jo chalk with stick ka pryog nahi karte vah asli kumhar or Kumbharo ke stock se nahi ate and sc hai.
Jai daksh Jai Prajapati
ReplyDeleteBilkul shi h bhai
ReplyDeleteSir prajapati samaj kis bagwan ke vansh se juda hai
ReplyDeleteBrahma ji se
DeleteGive vanshavali
DeleteYes ham log king Daksh prajapati ke vanshaj hai aur hmra record vede mai bhe h
DeleteJay daksh..
ReplyDeleteSahi hai bhai mai kisi bharhman ke pair nahi padtq kauki mai prajapati hu or bharhman se baddq hu vo bhikh mange bhrahman ke kene se kuch nahi hone vala
ReplyDeleteKoi mujhe vanshavali de sakta hai kumhar caste ki
ReplyDeleteकुम्भार कोई जाति नहीं जा भाई ,जिसको मिट्टी की कला आती है वो सभी कुम्हार है ये कर्म से संबंधित है, अगर आप वर्दिय है तो आप सातवाहन वंश के वंशज है और हमारे राजा ,राजा शालीवाहन है राजा शालीवाहन कि माता कुम्भार थी पर पिता राजवंशी थे और सातवाहन साम्राज्य में मातृसत्तात्मकता थी इसलिए उनको गौतमी पुत्र सत्कारणी कहते हैं,अगर आपके पास अच्छे कपड़े सिलने की कला हैं तो आप दर्जी तो नही लिख सकते ना , ये सब सिल्प काल है भाई मेरे
DeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteSabhi jatiya prajapati Brahma ke vansaj hai lekin kumhar jati ke log Brahma ke kis putra ke vansaj hain .......
ReplyDeleteMai bhi kumhar hu lekin Maine Brahma ke kisi putra ke vanshavali me kumhar jati nahi dekhi
जय दक्षवंशी🙏🙏🙏
ReplyDeletePrajapati or Rajan or Raje Rajanya Brother
ReplyDeleteKumhar or Kumbhar na to Brahamin hai, na vaish hai or na shudra hai, but Kumbhar or Kumbhar, Hindu rituals me Kshatriya hai
Vedic kal me pehla Verna Prajapati or Kshatriya or Rajnya tha uske baad Brahmin, vaish, shudra ate the
Hinduism me Kumbhar or kumhar Kshatriya or chhettri hai
Dakshin Bharat me kelkar committee mentioned or listed Kummara Kshatriya, Kumbhakshatriya, chhatrapati Kumbhar, Maratha Kshatriya Kumbhar, Rana Kahatriya Kumbhar, Chera, Chola, Pandya(Verman or Verma smrajya), wodyeyar sub caste of Kumbhar or Kumhars.
ReplyDeleteRoyal caste, Kumbhar or Kumhar and traders are right hand superior caste in dakshin Bharat.
राजपूत से कुम्हार (प्रजापति) का जन्म नहीं बल्कि प्रजापति से राजपूत का जन्म हुआ....
ReplyDeleteजो जाति सब जातियों की संसार की आदि व पूर्वज जाति है जो भारत व संसार के कोने-कोने में है उसके बारे में उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ लोग कहते है कि कुम्हार जाति राजपूतों से निकली जाति है जबकि राजपूत नाम तो मुसलमानों को दिया नाम है जो मुगलकाल के समय से प्रचलित हुआ है। पहले ये क्षत्रिय नाम से जाने जाते थे और इनके पूर्वज व ये कुम्हार ही है। इनका शरीर कुम्हार है। मिट्टी का है जो मिट्टी में ही समा जाता है।
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